गुना में रेपिस्ट पिता को आजीवन कारावास: सोते समय बेटी से किया था बलात्कार; कोर्ट बोली- बालिकाएं अपने आप को सुरक्षित महसूस नहीं करेंगी

गुना7 घंटे पहले

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गुना में रेप के आरोपी पिता को अदालत ने आजीवन कारावास की सजा सुनाई है। पिता ने अपनी ही नाबालिग बेटी के दुष्कर्म कर हैवानियत की हदें पार कर दीं थी। इस दौरान कोर्ट ने महत्वपूर्ण टिप्पणी भी की। कोर्ट ने कहा कि आरोपी अपनी वासना में इतना वशीभूत था कि उसे यह भी ध्यान नहीं आया की बच्ची उसी से उत्पन्न संतान है, जिसने उसने ही उंगली पकड़कर चलना सिखाया होगा। ऐसे आरोपियों को देखकर निश्चित ही सभ्य समाज में रहने वाली बालिकाएं अपने आप को सुरक्षित महसूस नहीं करेंगी। पॉक्सो मामलों की विशेष अदालत ने मेम्ले में फैसला सुनाया।

मामला वर्ष 2021 का है। 13 वर्षीय एक नाबालिग रात के दस बजे घर पर कमरे में खटिया पर अकेली सो रही थी। उसकी मां बगल के कमरे में सो रही थी। तभी उसके पिता ने बगल में आकर उसका मुंह तौलिया से बंद करउसके साथ जबरदस्ती गलत काम किया। उसे धमकी दी थी कि किसी को बताया तो जान से खत्म कर देगा। बच्ची ने कुछ दिन बाद सारी बात अपनी मां को बताई। दोनों ने थाने पहुंचकर शिकायत की, जिसके बाद आरोपी पिता के खिलाफ मामला दर्ज किया गया।

पुलिस ने मामला दर्ज कर बच्ची का मेडिकल कराया और आरोपी को गिरफ्तार किया। कोर्ट ने मामले की सुनवाई करते हुए आरोपी को सजा सुनाई। आरोपी पिता को आजीवन कारावास की सजा सुनाई गई। साथ ही आरोपी पर अर्थदंड भी लगाया गया। इसके अलावा कोर्ट ने नाबलिग बच्ची को दो लाख रुपये प्रतिकर राशि देने के भी आदेश दिए।

ऐसे लोगों को समाज में रहने का अधिकार नहीं

मामले की सुनवाई करते हुए कोर्ट ने महत्वपूर्ण टिप्पणी की। कोर्ट ने कहा कि ” आरोपी को यह ध्यान भी नहीं आया कि पीड़ित बालिका जो उसी से उत्पन्न उसकी संतान हैं जिसे निश्चित रूप से आरोपी ने ही उंगली पकड़कर चलना सिखाया होगा। एक पिता से ही यह सामान्य अपेक्षा की जाती है कि वह अपनी अवयस्क संतान को समाज के सभी आपदाओं से सुरक्षित रखेगा और इस दुनिया में पीड़िता के पिता के संरक्षण के अलावा और कोई सुरक्षित स्थान भी नहीं है। उसके बावजूद भी आरोपी ने मर्यादाओं की समस्त सीमा को लांघते हुए भक्षक बनकर अपनी पुत्री के साथ दुष्कर्म किया। इस प्रकार के अपराध के मनोभाव रखने वाला व्यक्ति सभ्य समाज के लिए सुरक्षित नहीं है। ऐसे अपराधियों को देखकर निश्चित ही सभ्य समाज में रहने वाली बालिकाएँ अपने आपको सुरक्षित महसूस नहीं करेंगी। अतः इस प्रकार के अपराधियों को समाज से पृथक रखना ही समाज के लिए हितकर है। ऐसी स्थिति में अपराध की गम्भीरता को दृष्टिगत रखते हुए उक्त दोषी व्यक्ति के प्रति नरम रूख अपनाने का कोई औचित्य नहीं है।”

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