डकैतों की शरणस्थली में खुलेंगे विकास के दरवाजे: चंबल के डकैत करहल में छुपते थे; PM मोदी यहां करेंगे स्व सहायता समूहों का सम्मेलन

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श्योपुरएक घंटा पहले

कॉपी लिंककरहल तिराहे पर लगी भारत माता की मूर्ति। - Dainik Bhaskar

करहल तिराहे पर लगी भारत माता की मूर्ति।

कभी चंबल के डकैतों और बागियों की शरणस्थली रहे करहल इलाके में अब विकास की संभावनाएं प्रबल हो गयी हैं। पर्यटन बढ़ने से इलाके का विकास होगा। लोगों में भी रोजगार और भविष्य की उम्मीदें जाएगी हैं। PM नरेंद्र मोदी शनिवार को अपने जन्मदिन के अवसर पर करहल के स्कूल में स्व सहायता समूहों के सम्मेलन को संबोधित करेंगे। इससे पहले वह कूनो में 8 अफ्रीकी चीते देश को समर्पित करेंगें। इसकी तैयारियां अंतिम चरण में हैं। रामबाबू गडरिया जैसे डकैतों ने कभी इसी इलाके में शरण ली थी।

श्योपुर जिले की करहल तहसील आदिवासी बाहुल्य है। चारों तरफ घना जंगल लगा हुआ है। यहां के रहने वाले विनोद शर्मा बताते हैं कि उनके पिता की उम्र 94 वर्ष की है। वह करहल से पहले पड़ने वाली पहाड़ी पर बने मंदिर के पुजारी हैं। अभी भी वह नियमित रूप से वहां जाते हैं। बड़े बुजुर्ग बताते हैं और उन्होंने खुद भी देखा हुआ है कि करहल इलाका चंबल के बागियों और डकैतों की शरणस्थली रहा है। डकैत चंबल के इलाके में वारदात कर यहां आकर शरण लेते थे। घने जंगल होने का फायदा उन्हें मिलता था। पुलिस भी इस इलाके में घुसने से डरती थी। कई नामचीन डकैतों ने यहां शरण ली और अपने दिन गुजारे हैं।

देवस्थानों पर लेते थे शरण

विनोद आगे बताते हैं कि करहल के पास कई देवस्थान हैं। इनमे देवखो, केरखो, आमखो, धोबिकुंडा, भँवरखो आदि प्रसिद्ध देवस्थान हैं। यही बागियों और डकैतों की शरणस्थली बनते थे। यह स्थान घने जंगल के बीच हैं। गर्मी के समय भी इन स्थानों पर पहाड़ियों से पानी गिरता रहता है। इसी वजह से डकैतों को यह जगह भाती थी। आज भी उनके यहां आने के प्रमाण मौजूद हैं। इन स्थानों पर उनके द्वारा खाना बनाने में इस्तेमाल किये जाने वाले पत्थर(सिलवटटा) वहां देखे जा सकते हैं।

रामबाबू गडरिया, रमेश सिकरवार जैसे नामचीनों ने यहां आकर शरण ली है। रमेश सिकरवार तो समर्पण करने के बाद जब जेल से रिहा हुए, तो सरकार ने उन्हें इसी इलाके में जमीन दी। वह आज भी यहीं रहते हैं। इसके अलावा रामबाबू गडरिया ने तो करहल से 6 किमी पहले पहाड़ी पर एक वारदात भी की थी। उसने एक बस मालिक के बेटे को अगवा कर यहीं छुपाया था। इसी तरह रमेश सिकरवार ने भी कुछ लोगों को पकड़कर इसी इलाके में रखा था।

पर्यटन से होगा विकास

पिछले दो हफ्तों से इस इलाके में काफी हलचल है। सैकड़ों गाड़ियां इधर से उधर दौड़ रही हैं। लगातार अफसरों का दौरा चल रहा है। कभी बागियों की शरणस्थली रहे इस इलाके को PM मोदी के सम्मेलन के लिए चुना गया है। जब से कूनो में चीते आने की बात सामने आयी है, तब से यहां के लोगों को उम्मीद जगी है। कूनो और इस इलाके में पर्यटन बढ़ता है तो गांव का भी विकास होगा। यहां के लोग इस बात से खुश और उत्साहित भी हैं कि अभी तक पिछड़े माने जाने वाले इस गांव में पर्यटन के लिहाज से बड़ा परिवर्तन होने जा रहा है।

आसमान पर पहुंचे जमीनों के भाव

विनोद बताते हैं कि आजकल इस इलाके में सबसे ज्यादा खोजबीन जमीनों की हो रही है। अभी तक बमुश्किल एक लाख रुपये बीघा अधिकतम दाम जमीनों के मिलते थे। कोई भी जमीन खरीदने को तैयार नहीं होता था। लेकिन जब से कूनो का सिलसिला आगे बड़ा है, यहां जमीनों की पूछ-परख बढ़ गयी है। जमीनों की कीमत 10 लाख रुपये बीघा तक पहुंच गई है।

मुख्य रोड और हाइवे से लगी जमीनों के दाम तो आसमान छू रहे हैं। इनकी कीमत 50 लाख रुपये प्रति बीघा तक देने को लोग तैयार हैं। रोजाना ही उनके पास कोई न कोई जमीन के बारे में पूछने के लिए आता है। वे लोग कहते हैं चाहे जितनी भी जमीन हो, बस मिल जाए। एक बीघा, आधा बीघा या उससे कम भी हो तो चलेगी। बस किसी तरह कोई जमीन दिला दें।

रोजगार के बढ़ेंगे अवसर

यह इलाका कूनो से सटा हुआ है। हालांकि, PM जहां चीतों को छोड़ने वाले हैं, वह जगह जरूर 35-40 किमी दूर है। लेकिन कूनो की सीमा बमुश्किल 5-7 किमी दूर है। कूनो में पर्यटन बढ़ने से यहां के युवाओं में भी रोजगार की उम्मीद जागी है। अभी तक वे खेती पर निर्भर थे। यहां उड़द, मक्का, बाजरा की खेती सबसे ज्यादा होती है। लेकिन पर्यटन बढ़ने से रोजगार के दूसरे अवसर भी पैदा होंगे। होटल, रिसोर्ट, भोजनालय सहित और भी कई तरह से प्रकल्प शुरू होने की संभावना जताई जा रही है।

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