बेबाक बात…: पैर मत पूजिए, बस जरा सी पीठ थपथपा दीजिए, देवी नहीं बनना, इंसान ही रहने दीजिए

भोपाल30 मिनट पहले

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नवरात्रि आते ही यूं लगने लगता है कि बच्चियां, बेटियां, औरतें ‘पूजनीय’ हो गई हैं। उनके सम्मान और एहतराम की स्केल न जाने क्यों नौ दिनों के लिए ज्यादा लंबी-चौड़ी हो जाती है। लेकिन, क्या उन्हें देवी बना देने की जरूरत है भी? क्या उनकी देह, मन और दुनियावी सेहत के लिए इंसान बना रहना ज्यादा जरूरी नहीं?

न पैर पूजिए। सिर पर आशीर्वाद की भी जरूरत नहीं। चाहो तो कंधे पर हाथ को हौसला बनाकर रख दें। या धीरे से तारीफ में पीठ ही थपथपा दें। वो भी तब, जब आपके जहन में जहर न हो। क्योंकि जब आप कंधे और पीठ पर हाथ धरेंगे तो औरत समझ जाती है कि आप छू कैसे रहे हैं। मान भी लो कि औरतों की पीठ पर भी आंख होती है। वो आंख आपके हाथ की टेढ़ी लकीरें पढ़ लेती है। ये मसला है बराबर हो जाने का। या तो आप सिर माथे पर रख लेते हो या फिर लतियाने लगते हो। दोनों ही नामंजूर है। बराबरी चाहिए। इंसान होने की। अधिकार की। घर से बाहर रहने की। और घर के भीतर रहने की। बोलने की। अहमियत देने की। नौकरी करने की। मर्जी की नौकरी करने की।

इंटरनेशनल लेबर ऑर्गेनाइजेशन कह रहा भारत में 2005 से 2021 के बीच नौकरी करने वाली औरतें 10 फीसदी कम हो गई हैं। और ये दुनिया में सबसे ज्यादा है। यही नहीं, इनमें से सबसे ज्यादा फीमेल्स ने नौकरी शादी के बाद छोड़ी है। नेशनल फैमिली हैल्थ सर्वे कहता है भारत में बमुश्किल 32% शादीशुदा महिलाएं नौकरी करती हैं। और उनमें से 14% के लिए ये फैसला उनके पति लेते हैं कि उनका कमाया कैश कहां-कब-कैसे खर्च किया जाएगा। पति के सामने अपनी बात कहने, मनवाने को तो इतिहास भी यही कहकर कुबूल कर चुका है कि बेचारा पति ‘गऊ’ है। लेकिन बराबरी की डिमांड तो हर जगह जायज है। तब और ज्यादा जब इसे हम औरतों की पीढ़ियां चुप रहकर किस्मत मान चुकी हैं।

दो दिन पहले सुप्रीम कोर्ट ने अबॉर्शन कानून में मैरिटल रेप को एंट्री दी है। वरना अब तक तो ये माना जाता था कि मैरिटल रेप मार्स से आई कोई दूसरी दुनिया की बात है। सुप्रीम कोर्ट ने कहा है कि जबरन संबंधों की वजह से पत्नी प्रेग्नेंट होती है, तो उसे अबॉर्शन का अधिकार है। लेकिन इस पर अब तक किसी ने मुंह नहीं खोला कि उसे प्रेग्नेंसी के दर्द में बिना मंजूरी धकेलने वाले पति को भी कोई सजा होनी चाहिए।

कानून काम करता रहेगा। लेकिन एक बार आप भी बराबरी देकर देख लीजिए। अधिकार की भी और सजा की भी। शायद मुकाबला थोड़ा बेहतर हो जाए।

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