सत्यनारायण भगवान मंदिर में 5 क्विंटल लड्डू चढ़ाए: महिलाओं ने रखे परिवार के लिए व्रत; मंदिर में शरद पूर्णिमा की रात होती है अमृत वर्षा

छतरपुर (मध्य प्रदेश)एक घंटा पहले

शरद पूर्णिमा पर्व पर रविवार को हटवारा में स्थित बुंदेलखंड के इकलौते सत्यनारायण भगवान के मंदिर में भारी भीड़ रही। भगवान को भोग अर्पित करने के लिए सुबह से महिलाओं का तांता लगा रहा। यह सिलसिला देर रात 12 बजे तक जारी रहेगा। यहां भगवान के दर्शन करने और मनोकामना पूरी करने के लिए पूरे बुंदेलखंड से श्रद्धालु पहुंचे।

शरद पूर्णिमा के दिन महिलाओं ने अपने बच्चों और परिवार की सुख, स्वास्थ्य, संपन्नता, धन, धान्य, समृद्धि, खुशहाली और दीर्घायु के लिए व्रत रखा है। सवा पाव खोवा और सवा पाव शक्कर मिलाकर छह लड्डू बनाकर पूजा की। इनमें से एक लड्डू सत्यनारायण भगवान को अर्पित किया। दूसरा लड्डू सहेली से बदला, तीसरा लड्डू गर्भवती महिला को दिया, चौथा लड्डू बाल-गोपाल और गायों को खिलाया, पांचवा लड्डू पति को और छठवां लड्डू खुद व्रतधारी महिला ने खाया।

जिले में इकलौता मंदिर जहां अष्टधातु की सत्यनारायण भगवान की मूर्ति

सत्यनानारायण भगवान का बुंदेलखंड अंचल में इकलौता मंदिर छतरपुर में है। इस कारण यहां जिले भर में कई हजार महिलाएं पूजन-दर्शन करने मंदिर पहुंचती हैं। साथ ही आस-पास के जिलों से लड्डू चढ़ाने का सिलसिला दूसरे दिन तक जारी रहता है। इतना ही नहीं दूर-दराज से कोरियर और डाक द्वारा भी आते हैं जो सत्यनारायण जी को चढ़ाये जाते हैं। यहां महिलाएं सत्यनारायण जी की पूजा-अर्चना कर 5 प्रकार की कथाएँ करती हैं।

5 कुंटल लड्डुओं का लगता है भोग

पुजारी ने बताया कि आज के दिन एक ही दिन में तकरीबन 5 क्विंटल लड्डुओं का भोग भगवान को अर्पित किया गया। वे यह मिष्ठान, प्रसाद के रूप में आने-जाने वाले दर्शनार्थियों और श्रद्धालुओं को वितरित कर दिए जाते हैं।

मंदिर और मूर्ति की कहानी

मंदिर के मुख्य पुजारी राममिलन भार्गव बताते हैं कि रियासतकालीन समय में महाराजा छत्रसाल के वंशजों ने सत्यनारायण भगवान की अष्टधातु की मूर्ति की स्थापना कराई थी। मूर्ति लगभग 300 साल से अधिक पुरानी है। पहले इसके पुजारी जागेष्वर प्रसाद भार्गव थे फिर पुजारी की गद्दी उनके पिता प्रकाशचंद्र भार्गव को मिली अब उनके बाद वह खुद सम्हाल रहे हैं।

1978-79 में मंदिर हुआ शिफ्ट

पहले यह मंदिर हटवारा इलाके में स्थित था पर 1978-79 में मंदिर से इस प्रतिमा को पुजारी प्रकाशचंद्र भार्गव अपने घर ले आए थे और यहां मकान की दूसरी मंजिल में यह प्रतिमा स्थापित कर दी थी। तकरीबन 45 सालों से यह प्रतिमा यहीं विराजमान है। और दूसरी मंजिल में ही मंदिर का निर्माण किया गया।

250-300 साल पुरानी प्रतिमा, पूजा है कठिन

मंदिर के मुख्य पुजारी की मानें तो यह सत्यनारायण भगवान की अष्टधातु की प्रतिमा ढाई सौ से तीन सौ साल पुरानी है। इसे रियासत काल में बनाया गया था। पुजारी ने बताया कि सत्यनारायण के अन्य मंदिर न होने की वजह यह है कि सत्यनारायण की पूजा बड़ी कठिन पूजा होती है। इस कारण से कम मंदिर हैं।

आज रात होती अमृत वर्षा

पुजारी बताते हैं कि आज के दिन का विशेष महत्व है जो भी आज सत्यनारायण के दर्शन पूजन कराठा है उसकी हर मनोकामना पूर्ण होती है। मान्यता है कि आज की रात आसमान चंद्रमा से अमृत वर्षा होती है और आज की रात माताएं बहनें खीर बनाकर खुले आसमान के नीचे रख देतीं हैं जिसमें अमृत गिरता है फिर सुबह इसका सेवन प्रसाद के रूप में किया जाता है।

जमीन पर नहीं होता सत्यनारायण का मंदिर

पुजारी ने बताया कि सत्यनारायण भगवान का मंदिर जमीन पर नहीं होता। मंदिर और मूर्ति की स्थापना जमीन पर नहीं की जाती है इसकी स्थापनी दूसरी मंजिल पर ही की जाती है। इस कारण जब हमारे पिताजी मूर्ति को लाए तो इसकी स्थापना हमने अपने घर के ऊपर दूसरी मंजिल पर की थी तब से अबतक यहीं विराजमान है। मंदिर में शरद पूर्णिमा, जन्माष्टमी, सावनतीज, और सावन के महीने में भजन, कथाएं, पूजन चलता रहता है।

बच्चों को कराया जाता चंद्र धारण

आज के दिन चंद्रमा अपने पूरे स्वरूप में रहता है माताएं-बहनें अपने बच्चों को चंद्र धारण कराती हैं और बच्चों को अपने सामर्थ अनुसार सोने, चांदी सहित अन्य धातु के चंद्रमा बनाकर पहनातीं हैं। ताकि उन्हें किसी तरह की नजर ना लगे और कोई बीमारी ना हो।

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