‘महाराज’ को मिले वेटेज से बढ़ीं BJP नेताओं की धड़कनें: महाकाल मंदिर से दिल्ली तक साथ गए सिंधिया; मंत्री सीधे सभास्थल पहुंचे

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मध्यप्रदेश9 मिनट पहलेलेखक: राजेश शर्मा

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प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के उज्जैन दौरे पर जिस तरह ‘महाराज’ को तवज्जो मिली, उसने बीजेपी नेताओं की नींद उड़ा दी है। मोदी जब महाकाल मंदिर में पूजा करने गए, तो मुख्यमंत्री और राज्यपाल के अलावा ‘महाराज’ यानी सिंधिया भी उनके साथ गए। जबकि मोदी कैबिनेट में शामिल एमपी के नेता सभास्थल पर पहुंचे।

एक सीनियर मिनिस्टर तो कार्यक्रम शुरू होने से करीब 45 मिनट पहले ही पहुंच गए थे। इतना ही नहीं, प्रधानमंत्री दिल्ली लौटे तो महाराज उनके साथ गए, जबकि उनका रात 10 बजे की इंडिगो की फ्लाइट से दिल्ली जाने का कार्यक्रम था। महाराज के प्रधानमंत्री के साथ दिल्ली जाने से प्रदेश के कई नेताओं की धड़कनें बढ़ गईं। यह इसलिए भी क्योंकि महाराज इंदौर पहुंचने के बाद संघ कार्यालय भी गए थे।

सिंधिया को वेटेज मिलने से भले ही बीजेपी नेताओं में बेचैनी है, लेकिन उनके समर्थक इसे शुभ संकेत के तौर पर देख रहे हैं। उनके समर्थक एक नेता ने तो यहां तक कहना शुरू कर दिया है- महाराज को मालवा में प्रोजेक्ट करने की तैयारी है।

नेताजी कहलाने लगे ‘ज्ञानंचद’

महाकाल लोक के लोकार्पण कार्यक्रम का बीजेपी ने जमकर प्रचार-प्रसार किया। पार्टी के एक सीनियर लीडर ने मंत्री-विधायकों और पार्टी पदाधिकारियों को बकायदा इसके लिए निर्देशित किया था। एक बैठक में उन्होंने कहा- महाकाल लोक बीजेपी के लिए बड़ी उपलब्धि है। हर स्तर पर इसका प्रचार करना चाहिए। इसके बाद मुख्यमंत्री शिवराज सिंह ने महाकाल लोक का लोगो सबसे पहले अपने सोशल मीडिया अकाउंट में अपलोड किया। जिसके बाद करीब-करीब सभी मंत्री, बीजेपी विधायकों और पार्टी पदाधिकारियों ने अपनी डीपी में महाकाल लोक का लोगो लगाया।

सुना है कि जिस सीनियर लीडर ने पार्टी नेताओं को निर्देश दिए थे, महाकाल लोक का लोगो डीपी में अपलोड करने को कहा था, उन्होंने खुद ऐसा नहीं किया। फिर क्या था, पार्टी के अंदर यह चर्चा का विषय बन गया। एक नेता की टिप्पणी- एक कहावत है, अनुशासन बनता नीचे है, लेकिन बिगड़ता ऊपर से है। पार्टी कुछ इसी तरह से चल रही है।

बता दें, दूसरों को निर्देश देकर खुद अमल नहीं करने वाले ये नेता दक्षिण भारत से संबंध रखते है, ये वही नेता हैं, जिनके एक बयान से पार्टी को बैकफुट में आना पड़ा था। अब दबी जुबान में उन्हें ‘ज्ञानचंद’ कहा जाने लगा है।

मंत्री से विभाग परेशान

मध्यप्रदेश में एक मंत्री ने मछली के ठेकों में रुचि लेना शुरू कर दिया है। वे हर ठेके में पर्दे के पीछे से शामिल हो रहे हैं। हाल ही में भोपाल के कुछ ठेकेदारों के साथ उनकी बैठक हुई। तय हुआ कि ठेके में मंत्री की पार्टनरशिप रहेगी। मंत्री मछली पालन विभाग के अफसरों को हर दूसरे दिन फोन लगाकर ठेके से संबंधित फाइल का अपडेट लेते हैं। इतना ही नहीं, फाइलें क्लीयर करने के निर्देश भी देने लगे हैं। इससे परेशान अफसरों ने मंत्री का मछली प्रेम ‘सरकार’ के कानों तक पहुंचा दिया है। साथ ही मंत्री को ‘मछलीमार मंत्री’ की उपमा दे दी है।

बता दें, विंध्य क्षेत्र से आने वाले मंत्री महोदय क्षेत्र में कम, भोपाल में ज्यादा समय रहते हैं। हाल ही में खाद्य विभाग के अफसर को फोन पर धमकाने का उनका ऑडियो वायरल हुआ था।

रिटायर्ड बिजली इंजीनियर के हवाले मरीजों की फाइलें

मुख्यमंत्री स्वेच्छानुदान फंड से गरीब मरीजों के इलाज के लिए सरकार आर्थिक सहायता देती है। इसके लिए अफसरों और कर्मचारियों की टीम काम करती है। जिसमें 2 डॉक्टर भी हैं। ये डॉक्टर मरीजों के आवेदन पर उनकी बीमारी और अस्पताल का वेरिफिकेशन करते हैं। सुना है कि अब एक रिटायर्ड बिजली इंजीनियर को संविदा नियुक्ति देकर इन डॉक्टरों के ऊपर बैठा दिया गया है। केस स्वीकृत करने में डॉक्टरों की सिफारिश कम और रिटायर्ड इंजीनियर को ज्यादा तवज्जो दी जा रही है। तवज्जो मिले भी क्यों ना? वे मुख्यमंत्री कार्यालय में पदस्थ एक अफसर के रिश्तेदार जो हैं।

बड़े साहब की जिद ‘सरकार’ के गले की फांस

नगरीय निकाय चुनाव से पहले सरकार ने ऐलान किया था कि अवैध निर्माण को वैध करने के लिए 30% कंपाउंडिंग हो सकेगी। इसका नोटिफिकेशन भी जारी कर दिया गया था। जिसका प्रचार भी जोर-शोर से किया गया। चुनाव की प्रक्रिया पूरी होने के बाद अब कंपाउंडिंग का दायरा घटाकर 10% करने का नोटिफिकेशन जारी हो गया। इसको लेकर कई मंत्री-विधायकों ने संगठन में शिकायत की है। सुना है कि इसके पीछे बड़े साहब हैं। दरअसल, जिस पॉश कॉलोनी में उन्होंने आलीशान बंगला बनाया है, वहां अधिकांश लोगों ने अतिक्रमण कर लिया है। साहब चाहते हैं कि उन्हें तोड़ा जाए। जबकि 30% अवैध निर्माण की फीस जमा कर वे वैध कराने तैयार थे, लेकिन ऐसा हो न सका। बड़े साहब वही हैं, जिन्होंने सीपीए को बंद करने ‘सरकार’ को राजी कर लिया था। बता दें, वे अगले महीने रिटायर होने वाले हैं।

और अंत में…

15 दिन में हो गया बंगले का रिनोवेशन

निर्माण कार्यों से जुड़े एक विभाग के प्रमुख सचिव 15 दिन की छुट्‌टी पर गए। उनका चार्ज एक अन्य विभाग के प्रमुख सचिव को मिल गया। सुना है कि उन्होंने अतिरिक्त प्रभार का आदेश मिलने के बाद पहला काम अपने बंगले का कराया। उन्होंने अफसरों को काम की लिस्ट थमा दी और 2 सप्ताह में इसे पूरा करने के निर्देश दे दिए। फिर क्या था, एक बड़ा अमला बंगले में दिन-रात काम कराने में लग गया। उनकी मजबूरी भी थी। दरअसल, साहब इस विभाग में पहले रह चुके हैं। उस अवधि की CR साहब को ही लिखना है। ऐसे में पंगा मोल लेने के बजाय काम करना ही बेहतर समझा। बता दें कि जिस बंगले में साहब रहते हैं, वह पहले मंत्री को आवंटित था।

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2018 में सत्ता गंवाने वाली BJP अब मिशन 2023 के लिए फूंक-फूंक कर कदम रख रही है। मैदानी स्तर पर तो रणनीति तैयार की ही जा रही है, नेताओं को भी एकजुट रहने की नसीहत दी जा रही है। हाल ही में रातापानी के जंगल में सियासी मंथन के लिए जुटे BJP नेताओं की बैठक में दिल्ली से आए एक बड़े पदाधिकारी ने कहा कि चुनाव जीतना है, तो पुरानी दोस्ती को जिंदा करो। IAS की पत्नी से बदसलूकी की, 2 का ट्रांसफर

मध्यप्रदेश की शिवराज सरकार ने पहली बार उज्जैन में कैबिनेट बैठक की। इसमें मुख्य कुर्सी पर भगवान महाकाल की तस्वीर रखी गई। सीएम और सभी मंत्री अगल-बगल बैठे। ‘सरकार’ की इस पहल की खूब चर्चा हुई, लेकिन बैठक से पहले एक वाकया ऐसा हुआ, जिसने थोड़ी देर के लिए पुलिस के होश उड़ा दिए। पुलिस अफसर के सामने धर्मसंकट खड़ा हो गया कि ‘सरकार’ को आगे जाने दें या ‘पंडितजी’ को, क्योंकि अपने ‘सरकार’ तो पंडित जी हैं। ‘राजा साहब’ के समर्थकों के टूटे सपने

सियासत में सब कुछ खुलकर नहीं कहा जाता है। इशारों में समझा दिया जाता और समझने वाले समझ जाते हैं। एमपी की राजनीति में पिछले दिनों ऐसा ही हुआ। जो दिख रहा था, हकीकत उससे कहीं अलग थी। पोषण आहार पर एजी (महालेखाकार) की रिपोर्ट लीक होना ‘सरकार’ पर अटैक था, लेकिन सियासत पर बारीक नजर रखने वाले अतीत की घटनाओं को जोड़कर वहां तक पहुंच गए, जहां इसकी स्क्रिप्ट तैयार की गई। ग्वालियर में बन रही ‘सरकार’ के ताले की डुप्लीकेट चाबी!

मध्यप्रदेश की राजनीति में ‘महाराज’ के बदले हुए अंदाज से सियासी गर्माहट बढ़ती जा रही है। इससे ‘सरकार’ के खेमे में खलबली है, लेकिन विरोध-समर्थन का खेल सार्वजनिक होने में वक्त लगेगा, क्योंकि पिक्चर अभी धुंधली है। सिंधिया अपनी महाराज वाली छाप मिटा तो नहीं रहे, लेकिन इसे अपना अतीत बताकर नई छवि गढ़ने में जुट गए हैं। ‘सरकार’ के सामने नरोत्तम को CM बनाने के लगे नारे…

‘जहां दम वहां हम’ नेताओं पर यह जुमला बिल्कुल फिट बैठता है। राजनीति की रवायत ही कुछ ऐसी है। बात MP की करें तो पिछले एक साल में जब-जब बीजेपी केंद्रीय नेतृत्व की नजरें यहां पड़ी, नेताओं में खलबली मच गई। बदलाव की बयार चलने के कयास भर से आस्था डोलने लगी। इस बार भी जब ‘सरकार’ बदलने की हवा उड़ी। ‘सरकार’ बदलने की हवा उड़ी तो आस्था डोलने लगी…

वोट बैंक की राजनीति जो कराए सो कम है। मध्यप्रदेश में BJP राष्ट्रपति पद की आदिवासी उम्मीदवार द्रोपदी मुर्मू को संख्या से ज्यादा वोट दिलाकर आला नेताओं की शाबाशी लूटना चाहती है। इसके लिए महाराष्ट्र का शिंदे फॉर्मूला अपनाया जा रहा है। यानी शिवसेना की तरह MP में कांग्रेस में तोड़फोड़…। सुना है कि BJP ने कोशिश भी की, लेकिन बात बाहर आ गई। माननीय को राज्यसभा का ऑफर

चुनाव लड़ना कोई सस्ता सौदा नहीं है। जेब ढीली करनी पड़ती है। पैसा ना हो तो अच्छे-अच्छे के आंसू निकल आते हैं। हुआ यूं कि MP के एक बड़े शहर में मेयर पद के लिए चुनाव लड़ रहीं BJP प्रत्याशी ने अपने घर पर बैठक बुलाई। इसमें कैंडिडेट के बहुत करीबी लोगों के साथ एक मंत्री भी शामिल हुए। BJP की मेयर कैंडिडेट के घर रो पड़े मंत्री…

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